Showing posts with label सुबह-सवेरे. Show all posts
Showing posts with label सुबह-सवेरे. Show all posts

November 7, 2011

रिमझिम बारिस


रिमझिम रिमझिम बारिस आती,
                                 मन को कितनी ठंडक लाती.

                                     मुरझाये पत्ते हरियाते,
                                     उपवन में पौधे लहराते.
                                     होजाती जीवंत प्रकृति है,
                                     जब काले बादल छा जाते.

                                     जंगल में है मोर नाचता,
                                     भालू अपना ढोल बजाता.
                                     कोयल मीठा गीत सुनाती,
                                     हाथी भी है तान मिलाता.

                                     आओ हम बारिस में भीगें,
                                     झूलों पर लें ऊंची पींगें.
                                     डर कर खड़े हुए क्यों अंदर,
                                     वैसे भरते इतनी डींगें.

                                    
                                     वर्षा गर्मी से है राहत लायी,
                                     हर मन में खुशियाँ हैं छायी.
                                     नया नया सा है सब लगता,
                                     जैसे प्रकृति नहा कर आयी.

November 5, 2011

फिर से नाच रहा है मोर



फिर से नाच रहा है मोर
चिरप्रतीक्षित वर्षा ॠतु आई है,
मैंढक मिलकर शोर मचाते
ले जल काली बदरी आई है।


गरज रहे हैं बादल काले
चमक रही नभ में बिजली है,
सूर्य जा छिपा बादल के पीछे
सतरंगी रंग नभ में छाए हैं।


चिहुँक रहे हैं पंछी सारे
भंवरे भी आज बौराए हैं,
खिल रही हैं सारी कलियाँ
तितली ने रंग बिखराए हैं।


हरित प्रहरी से वृक्ष झूमते
मादक सुमन सुगन्ध छाई है,
हर मन हो रहा आज बाँवरा
सावन ने प्रणय धुन बजाई है।


रिमझिम पड़ती बौछारों से
नई कोंपलें चहुँओर उग आईं हैं,
धरती का आँचल हरा हो गया
अम्बर ने नए वस्त्र पहनाए हैं।


पंख फैलाकर मोर नाचता
मोरनी को उसे लुभाना है,
झूम झूमकर नाच नाचकर
प्रिया को आज रिझाना है।

जब मति मारी जाए


पत्नी के बगैर जिनका
एक पल काम चल न पाए
ऐसे लोगों की
जब मति मारी जाए
तो वे पत्नी से लड़ लेते हैं
और कुछ कर तो सकते नहीं
बोलना छोड़ देते हैं।

किसी छोटी सी बात पर
दिल अपना तोड़ लिया था
और
खदेरन ने फुलमतिया जी से
बोलना छोड़ दिया था।

अगले दिन उसे किसी काम से
सुबह चार बजे जाना था
और चार बजे उठने के लिए
फुलमतिया जी को मनाना था।

पर तभी उसका पुरुष अहं आड़े आया
‘पहले बोलना’
उसके मन को नहीं भाया।

बिना बोले भी काम चल जाए
उसने एक तरकीब निकाली
और फुलमतिया जी के नाम
एक चिट्ठी लिख डाली।

खत पर फिर से एक दृष्टिपात किया
और उसे फुलमतिया जी के
सिरहाने रख दिया।

लिखा था,
“देखो इसे तुम मेरा
सीजफ़ायर मत समझ लेना
जाना है ज़रूरी काम से
मुझे चार बजे जगा देना।

अगली सुबह जब उसकी आंख खुली
तो दीवार घड़ी नौ बजा रही थी।
उसकी ट्रेन तो
कब की जा चुकी थी।

गुस्से से उसका दिमाग भन्नाया
मन ही मन वह पत्नी पर
मन-ही-मन चिल्लाया
‘करम मेरी फूटी
जो इसके साथ लिए सात फेरे
जगा नहीं सकती थी
मुझको सुबह-सवेरे!’

तभी उसकी नज़र सिरहाने पर पड़ी
एक ख़त उसका इंतज़ार कर रहा था
खोला और देखा उसमें लिखा था
“अब हर बात में
मेरा ही दोष मत बताइए।
सुबह के चार बज गये हैं
जाग जाइए।”