March 17, 2013

दिल की सुनाते हैं ..

आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं 
और एक बार वही वादे दुहराते हैं 

आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं...

देखे थे ख्वाब कभी मिलके जो हमने 
थोड़ी सी कोशिश और सच कर दिखाते हैं 
आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं 

खुद की सुनने को आज वक़्त नहीं मिलता 
ज़िन्दगी की दौड़ में कुछ लम्हा ठहर जाते हैं 
आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं 

बैठेंगे दो यार साथ कुछ तो करेंगे 
ख्वाइशों की लम्बी एक पर्ची बनाते हैं 
आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं 

देखो जिधर गम की महफ़िल लगी है 
रोने वाले को चलो थोडा हंसाते हैं 
आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं 

राह-ए-ज़िन्दगी में मिलते हैं कितने 
खास हैं वो नाम जो याद रह जाते हैं 
आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं 

पत्थरों के घर की मियादें हैं छोटी 
लोगों के दिल को ठिकाना बनाते हैं 
आज दोस्त तुमको दिल की सुनाते हैं 

बीत गया लम्हा न आएगा फिर से 
पल भर की सही आज खुशियाँ मानते हैं 
आज "दीप"  तुमको दिल की सुनाते हैं 

शिवरात्रि के दिन...








कितना टेरता हूँ खटराग,
एक ही, एक सा, अनुदिन!
आलोड़ित इतिवृत्तों में,
कोंचता रहता हूँ,
प्रत्येक निःसृत विषण्णता।

निस्पृह होने-दिखने की,
निस्सीम स्पृहा दबाये अंतस में,
कूटता रहता हूँ विवोध।

फेंटता रहता हूँ आसव,
सुदूर प्रांतर से लाये,
स्निग्ध मृदुल पुष्पों का।

लिख देना चाहता हूँ उनसे,
अपने गढ़े संतोषी आख्यान।
असफलता को द्युतिसूत्र बता,
यत्न करता हूँ ठठाने का।

यह अहेतुक केलि देख,
अब तक शांति से मुस्काता,
चिर तेजस्वी बिल्व किसलय,
आज चंद्रमौलि हो जाता है।

कभी निष्कंप मैं भी,
चुपचाप झड सकूँ तो....

आयु भर आशीष




झुण्ड से छूटा, साथ से रूठा,
एक था बिचड़ा गिरा यहाँ।
गीति के नवजात शिशु को,
मरने देती क्षिति कहाँ।

पावस में घिर आते शत घन,
बाकि दिव सुथराई के कण।
धमनी-धमनी स्थान रुधिर के,
माँ का संचित नेह बहा।

सूर्य रश्मियाँ पुष्ट बनाती,
विधु की किरणे थीं दुलरातीं।
और मृदुल नभ के तारागण,
हर अठखेली पर मुस्काते।

तृण के नोक ललाट चूमते,
अलि धावन के बाद घूमते।
वल्लरियाँ थीं दीठ बचातीं,
गिरते पर्णों ने मीत कहा।

दिवस बीतते, रात बीतती,
शीतलता औ घाम बीतती।
बालक ने आशीष मान कर,
सबको दे सम्मान सहा।

बारी-बारी सब ऋतुओं ने,
भांति-भांति के पाठ सिखाये।
पराक्रमी कर्ष-मर्ष कौशल पर,
वानीर झुण्ड ने हाथ उठाये।

गभुआरे नन्हे कोमल तन,
को सालस थपकाती गन्धवह।
चीं-चीं मर्मर क्षिप्र ही गढ़ कर,
खग कीटों ने गीत कहा।

खेचर नित आशीष वारते,
गहते हाथ, औ मूंज बाँधते।
"रागों में तुम वीतराग हो!"
"हो अलोल!"- यह बोल उचारते।

मौलसिरी ने आसव छिडका,
नीप-तमाल ने नेह से झिड़का।
आम छोड़ के उतरी कोयल,
कान में गुपचुप प्रीत कहा।

नियति-नटी अपनी गति खेली,
सुभट शाख किंकिणियाँ फूलीं।
जिसने देखा वही अघाया,
"उत्तरीय तुम्हारा स्वर्ण!"- कहा।

कुछ बात तो है .....

दो कच्चे  धागों  को 
जोड़ कर आपस में 
दिया जाता है जब  वट
तो हो जाते हैं मजबूत , 
हल्के से तनाव से 
नहीं जाते वे टूट ,

वैसे ही तुम और मैं 
साल दर साल 
वक़्त के साथ वट 
लगाते लगाते 
जुड़ चुके हैं इस कदर 
कि आसान नहीं है 
कोई भी  परिस्थिति 
तोड़ सके हमें  ।

कुछ बात तो है --
कि एक दूसरे से 
हैं शायद 
ढेरों शिकवे - शिकायतें 
फिर भी 
एक - दूजे के बिना 
लगता है अधूरापन । 
और इसी खयाल से 
आज के दिन 
तोहफे के रूप में 
मैं तुम्हें देती हूँ 
अपनी सारी  संवेदनाएं , 
ख्वाहिशें और  खुशियाँ ।

Posted by -Ankit Vijay at Faridabad  at 8:00 pm

November 8, 2011

बड़े अजीब हैं ये जिन्दगी के रास्ते,


बड़े अजीब हैं ये जिन्दगी के रास्ते,
अनजान मोड़ पर कुछ लोग दोस्त बन जाते हैं,
मिलने की खुशी दे या न दे,
बिछड़ने का गम जरूर दे जाते हैं
मत करो कोई वायदा जिसे तुम निभा न सको,
मत चाहो उसे जिसे तुम पा न सको,
प्यार कहां किसी का पूरा होता है,
इसका तो पहला शब्द की अधूरा होता है।
मेरी हर खता पर नाराज न होना,
अपनी प्यारी सी मुस्कान कभी न खोना,
सुकून है देख कर आपकी मुस्कुराहट को,
मुझे मौत भी आए तो भी मत रोना।
भूलना तुम्हें न आसान होगा,
जो भूले तुम्हें वो नादान होगा,
आप तो बसते हो रूह में हमारी,
आप हमें न भुलाएं ये आपको अहसान होगा।
कभी किसी से जिक्र-ए-जुदाई मत करना,
इस दिल से कभी रुसवाई मत करना,
जब दिल उठ जाए हमसे तो बता देना,
ना बता कर बेवफाई मत करना।

"खुद से जुदा हुए अब मुझे हो गया जमाना"

कभी कहीं मैं तुम्हे मिल जांऊ किन्ही राहों में,
तो लौटा देना मुझे महफूज मेरी पन्हाओं में,
खुद से जुदा हुए अब मूझे हो गया जमाना,
अपनी तस्वीर भी नहीं बाकी मेरी निगाहों में,
सुबह चला था कि शाम तक लौट आउंगा,
क्या पता था कि यूं सर-ए-बाजार खो जाउंगा,
सबने लूटा मिलके मुझसे बिछड़े हुए मुझको,
जुम्बिश तक भी ना छोड़ी हाथ-पांव में,
क्या जुर्म था मेरा क्या कभी मैं जान पाउंगा
क्या अपनी दास्तान कभी खुद को सुना पाउंगा
क्या एक अजनबी बन के आगे से गुजर जाउंगा
या फिर से भर लूंगा खुद को अपनी बाहों में
नहीं मालूम मुझे अंजाम मेरे इस फसाने का
जिसके हर पन्ने पर दर्द है खुद से बिछड़ जाने का
स्याही का रंग भी है मेरे खून से मिलता जुलता
और हर अल्फाज है धुंधला गम के सायों में
कभी कहीं मैं तुम्हे मिल जाऊं किन्हीं राहों में,
तो लौट देना मुझे महफूज मेरी पन्हाओं में,
खुद से जुदा हुए अब मुझे हो गया जमाना,
अपनी तस्वीर भी नहीं बाकी मेरी निगाहों में

"दिल अभी उदास है"

दिल अभी उदास है,
और वक्त बीता नहीं।
नसीब की किताब से,
हिसाब जीता नहीं।


टूटा है जब भ्रम,
आंखे होती हैं क्यूं नम।
क्यूं मंजिल करीब हो,
तो हार जाते हैं कदम।

ये कौन से सवाल हैं,
जवाब सूझता नहीं।
जहां भर की बात की,
जो बात थी नहीं कही।

वो कौन सी है बेबसी,
वो कौन सा अजब है।
की जिसके रू से आज,
मेरा नाम भी खराब है।

दिल अभी उदास है.......